भारतीय गर्व का ज्वलन्त प्रतीक अग्नि-5
भारतीय गर्व का ज्वलन्त प्रतीक अग्नि-5
विज्ञान पर बढ़ती निर्भरता और प्रौद्योगिकी के नए आयामों को टटोलती इस दुनिया ने सब कुछ बदल डाला है। विकास के साथ आत्मरक्षा को लेकर पूरी दुनिया की चिंताओं में इजाफा ही हुआ है और हरेक देश ने अपने रक्षा बजट में बेतहाशा बढ़ोतरी की है। ऐसे में अस्थिर दक्षिण एशिया का हरेक देश अपनी सीमाओं को चाक चैबंद रखने का भरसक प्रयास कर रहा है। रक्षा क्षेत्र में कुछ साल पहले तक बेहतर लड़ाकू विमानों का बोलबाला था लेकिन अब ताकत की इस दुनिया में आधुनिक मिसाइलों की तूती बोल रही है। भारत का अपनी अग्नि श्रेणी की पांचवी पीढ़ी का सफल परीक्षण इस तथ्य की पुष्टि करता है।
अग्नि-5 एक अन्तरमहाद्वीपीय श्रेणी की मिसाइल है जो रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित की गई है। सतह से सतह तक मार करने वाली अग्नि पांच को ओडि़शा तट पर व्हीलर द्वीप से मोबाइल प्लेटफार्म के जरिए प्रक्षेपित किया गया। परीक्षण के दौरान 17.5 मीटर लम्बी अग्नि-5 मिसाइल को 600 किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाया गया और उसे 7,000 मीटर प्रति सेकंड के वेग के साथ इस्तेमाल किया गया ताकि वह अपने लक्ष्य को निशाना बना सके। इसके साथ ही भारत उन चार देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो गया जिनके पास अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। अमेरिका, रूस व चीन के बाद भारत ऐसा चैथा देश है जिसके पास इस तरह की मिसाइल है। भारत को अग्नि-5 मिसाइल को बनाने में चार साल का समय लगा। अग्नि-5 की क्षमता अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) की मारक क्षमता से 500 किलोमीटर कम है। दुनियाभर में आईसीबीएम के लिए 5,500 किलोमीटर से ज्यादा की मारक क्षमता मान्य है। अग्नि-5 को 2014 के अंत तक सशस्त्र बलों में शामिल किए जाने से पहले उसे परीक्षणों की एक श्रृंखला से गुजारा जाएगा लेकिन यह मिसाइल भारत को चीन में अंदर तक व पूरे पाकिस्तानी क्षेत्र में लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता प्रदान करती है। वैसे भारत परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की अपनी नीति पर कायम है। अग्नि-5 व नवंबर 2011 में परीक्षण की गई अग्नि-4 मिसाइलें भारत के दुश्मनों के सामने उसके खिलाफ परमाणु हमले के लिए बाधा खड़ी करती हैं। भारत के पड़ोसी चीन के पास 11,500 किलोमीटर मारक क्षमता वाली अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल डेंग फांग-31ए है, जो दक्षिण एशिया में कहीं भी निशाना साध सकती है।
‘अग्नि-5’ में एमआईआरवी (मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल रीएंट्री व्हीकल) तकनीक का प्रयोग किया गया है। इस तकनीक के माध्यम से मिसाइल को पृथ्वी से अंतरिक्ष में ले जाने में मदद तो मिलती ही है, अंतरिक्ष से पृथ्वी पर वापस आने में भी इसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस तकनीक के जरिए यह मिसाइल पहले पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर निकलती है और लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ती है, फिर वापस पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर लक्ष्य को नेस्तनाबूद कर देती है. वायुमंडल से बाहर निकलते ही यह मिसाइल दुश्मन के राडार से ओझल तो हो ही जाती है, दुश्मन के उपग्रहों की पकड़ में भी नहीं आती। सर्वप्रथम इस तकनीक का इस्तेमाल वर्ष 1970 में अमरीका ने किया था। इसके बाद 1975 में रूस ने इसका प्रयोग किया. अमरीका ने प्रति मिसाइल वारहेड में परमाणु हथियारों की संख्या 6 रखी थी, जबकि रूस ने वारहेड में 10 परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया था लेकिन भारत ने अग्नि-5 मिसाइल के वारहेड में तीन परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया है। जाहिर है इस तकनीक के प्रयोग से अग्नि-5 एक साथ अनेक निशानें साधनें में सक्षम हो गई है। अग्नि-5 की विशेषता यह है कि इस मिसाइल में इस्तेमाल की गई तकनीक अमरीका जैसे देशों की मिसाइलों में उपयोग होने वाली तकनीक से भी बेहतर है। इसकी तकनीकों में समग्र राकेट मोटर, माइक्रो नेवीगेशन सिस्टम (एमआईएनडीएस) शामिल है। डीआरडीओ अगले एक साल में मिसाइल के दो और परीक्षण करेगा और हर परीक्षण में हासिल किए गए आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर अगला परीक्षण किया जाएगा। अग्नि-5 को पूरी तरह विकसित होने में अभी और परीक्षण की जरूरत है. वर्ष 2010 में अग्नि-3 के सफल प्रक्षेपण और उसके बाद 2011 में अग्नि-4 के सफल प्रक्षेपण के बाद उसी डिजाइन को अग्नि-5 के लिए विकसित किया गया है. अग्नि-5 तीन राकेटों के सहारे काम करता है और उसमें ठोस ईधन का प्रयोग होता है। दोनों मिसाइलों में एक्लसलेरोमीटर समेत 60 फीसद हिस्से समान हैं। अग्नि-5 के विकास में तीसरे स्टेज पर काम करना मिसाइल वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती रही। इस स्टेज (तीसरे स्टेज) का मोटर कोनिकल है, जब कि मिसाइल वैज्ञानिकों ने इसके पहले तक सिर्फ बेलनाकार (सिलेंड्रिकल) मोटर पर काम किया था।
‘अग्नि-5’ के विकास पर तकरीबन 2500 करोड़ रुपए की लागत आई है। इस मिसाइल के विकास और निर्माण में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के 1200 रक्षा वैज्ञानिकों और तकनीशियनों ने अपना अथक, शानदार और ऐतिहासिक योगदान दिया है। 4-5 परीक्षणों के बाद ‘अग्नि-5’ को वर्ष 2014-15 तक सेना में शामिल कर लेने की योजना है। इस वर्ष ‘अग्नि 5’ के दो और परीक्षण किए जाने की योजना पर डीआरडीओ काम कर रहा है। भारत का मिसाइल कार्यक्रम आजादी के तकरीबन दस साल बाद 1958 में ही शुरू हो गया था जब स्पेशल वीपंस डेवलपमेंट टीम का गठन हुआ। बाद में इसका नाम डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेट्रीज (डीआरडीएल) कर दिया गया।
डीआरडीएल ने फ्रांस की मदद से लंबी दूरी की मिसाइल बनाने की कोशिश की, साथ में जमीन से हवा में मार करने वाली रूस की एसए-2 मिसाइल की कॉपी तैयार करनी चाही लेकिन दोनों प्रोजेक्ट फेल हो गए लेकिन इन असफलताओं ने कुछ हद तक देश के मिसाइल कार्यक्रम की नींव तो रख ही दी। भारतीय मिसाइल परिदृश्य में आमूल परिवर्तन अस्सी और नब्बे के दशक में हुआ। 1984 में एपीजे अब्दुल कलाम के निर्देशन में भारतीय मिसाइल कार्यक्रम की शुरुआत हुई और सफलता की नई इबारत लिखी गई।
1988 में पृथ्वी मिसाइल के पहले परीक्षण से भारत ने पूरी दुनिया को आश्चर्य में डाल दिया हालांकि पृथ्वी की अपनी सीमाएं थी लेकिन इसने भारतीय तकनीक को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई। पृथ्वी से अग्नि-5 तक पहुंचने में भारतीय वैज्ञानिकों को पच्चीस साल से भी कम समय लगा है। भारत का मिसाइल कार्यक्रम शुरू में पाकिस्तान को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था लेकिन अग्नि-5 की क्षमता चीन को नजर में रखकर तय की गई। अग्नि-5 की वजह से चीन का सुदूर क्षेत्र भी भारत की पहुंच में होगा लेकिन फिलहाल अग्नि-5 मध्य से लंबी दूरी की तकनीक हासिल करने का जरिया मानी जा सकती है।
अग्नि श्रेणी से जुड़ी दो और मिसाइलों के-15 और के-4 पर भी भारतीय वैज्ञानिक तेजी से काम कर रहे हैं। ये पनडुब्बी से दागी जाने वाली श्रेणी की मिसाइलें हैं। 750 किमी मारक क्षमता वाली के-15 और 3500 किमी क्षमता वाली के-4 भविष्य में देश की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत का मुख्य हथियार होंगी। भारत पानी पर भी अपनी सामरिक ताकत बढ़ाना चाहता है ताकि अपनी समुद्री सीमाओं की भी वह बखूबी रक्षा कर सके और पानी की तरफ से होने वाले हमलों का पुरजोर जवाब दे सके। इन मिसाइलों को सफलता पूर्वक विकसित कर लेने के साथ ही देश परमाणु हमला करने के तीनों माध्यमों से लैस हो जाएगा। चीन के पास अग्नि-5 से दोगुनी रेंज वाली डीएफ-31 जैसी मिसाइल है इसलिए भारत की नजर अब अग्नि-6 पर होगी। अग्नि-6 को ‘सूर्या’ नाम भी दिया गया है जो भारत के मिसाइल कार्यक्रम का भविष्य कही जाती है। 6-10 हजार किमी रेंज वाली सूर्या-1 मिसाइल अग्नि-5 के बाद भारतीय वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य है। भारतीय वैज्ञानिकों की तैयारी देखते हुए लगता है कि वे सूर्या-2 तक जल्दी ही अपनी पहुंच बना लेंगे। सूर्या-2 की रेंज 15 से 20 हजार किमी तक होगी और यह पश्चिमी देशों की आईसीबीएम ‘मिनटमैन’ और ‘ट्राइडेंट’ से अव्वल साबित होगी।
लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों के लिए यह आसान चुनौती नहीं होगी क्योंकि पीएसएलवी के मुकाबले जीएसएलवी के प्रक्षेपण में भारत को बेहतर कामयाबी नहीं मिली है। 10-20 हजार किलोमीटर रेंज के लिए लंबी दूरी तक चलने वाले रॉकेट तकनीक की भी जरूरत होगी और यह जीएसएलवी की मदद से ही मुमिकन है लेकिन जीएसएलवी कार्यक्रम के तहत 2010 में हुए दो प्रक्षेपण विफल रहे थे। इससे इसरो को गहरा झटका लगा था और देश को आर्थिक नुकसान भी हुआ। सूर्या-1 और सूर्या-2 की सफलता जीएसएलवी की कामयाबी से ही मुमकिन है क्योंकि इसमें प्रयुक्त क्रायोजेनिक इंजन इसका आधार है। दिक्कत यह है कि स्वदेशी तकनीक वाला क्रायोजेनिक इंजन विफल रहा है और अग्नि-5 के बाद अग्नि-6 बेहतर क्रायोजेनिक इंजन के आधार पर ही तैयार की जा सकती है. लेकिन अग्नि-5 की सफलता के बाद भारतीय वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जल्द ही यह बाधा भी दूर कर ली जाएगी। स्ट्रैटेजिक हथियार, चाहे वह परमाणु पनडुब्बी हो या फिर लंबी दूरी की मिसाइल, सरकार ने इनसे जुड़े बड़े फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। इसकी मुख्य वजह सीमा पार से बढ़ता दबाव कहा जा सकता है जिसकी अनदेखी करना आसान नहीं है। पाकिस्तान लगातार अपनी मिसाइल क्षमता बढ़ाता जा रहा है। उसके पास गजनी और बाबर जैसी लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें है। ये मिसाइले परमाणू हथियार ले जाने में सक्षम है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है और इस लिए वह मिसाइल प्रतिरोधी प्रणाली पर भी काम कर रहा है ताकि दुश्मन मिसाइल को समय से पहले नष्ट किया जा सके।
अग्नि-5 के परीक्षण को लेकर चीन की तरफ से आ रहे बयानों से समझा जा सकता है कि दोनों देश आर्थिक संबंधों को लेकर कितने भी गंभीर क्यों न हों लेकिन सीमा को लेकर खींचतान जारी रहेगी और चीन, भारत को तब तक धमकाता रहेगा जब तक भारत सूर्या-1 जैसी मिसाइल से लैस न हो जाए। अभी चीन ने तिब्बत में कई ऐसी मिसाइलों को तैनात किया हुआ है जिनके निशाने पर भारत है. लंबी दूरी की ये मिसाइलें 8-10 हजार किलोमीटर तक मार कर सकती है।
चीन अपनी परमाणु पनडुब्बियों को भी लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों से लैस कर चुका है। ऐसे में चीन की तुलना में भारतीय मिसाइल कार्यक्रम कुछ धीमा जरूर है लेकिन भविष्य में भारत उसके बराबर खड़ा दिखाई देगा और इसकी बुनियाद अग्नि-5 ने रख दी है। भारत निश्चित तौर पर दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ पैदा नहीं करना चाहता है इसलिए उसने इस परीक्षण को सबकी जानकारी में किया और वेपन आॅफ पीस से यह संदेश देने की प्रयत्न किया कि वह पहले हमला नहीं करेगा लेकिन अपने ऊपर होने वाले हमलों का मंुहतोड़ जवाब देने में सक्षम है।
अग्निः 5 विशेष
1- अग्नि 5 से भारत इंटरकॉन्टिनेंटल बलिस्टिक मिसाइल (प्ब्ठड ) क्लब में शामिल हो जाएगा। अमेरिका, रूस और चीन पहले से ही इस तरह की मिसाइलों से लैस हैं।
2- अग्नि-5 20 मिनट में पांच हजार किलोमीटर की दूरी तय कर लेगी और डेढ़ मीटर के टारगेट पर निशाना लगा लेगी।
3- अग्नि-5 से अमेरिका को छोड़कर पूरा एशिया, अफ्रीका और यूरोप भारत मिसाइलों की मारक क्षमता के घेरे में आ जाएगा।
4- यह मिसाइल दागो और भूल जाओ सिद्धान्त पर काम करेगी और न्यूक्लियर हथियार ले जाने में सक्षम होगी।
5- अग्नि-5 की सहातया से भारत एक मिसाइल से कई न्यूक्लियर वॉरहेड छोड़ने में सक्षम हो पाया है।
6- अग्नि 5 मिसाइल में प्रयोग की गई तकनीक का उपयोग छोटे सैटेलाइट छोड़ने में भी हो सकेगा।
7 -इसे केवल भारत के प्रधानमंत्री के आदेश के बाद ही इस्तेमाल किया जाएगा। भारत इसे वेपन ऑफ पीस कह रहा है।
8- 17 मीटर ऊंची यह मिसाइल तीन स्टेज में मार करेगी। पहला रॉकेट इंजन इसे 40 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जाएगा। दूसरे स्टेज में यह 150 किलोमीटर तक जाएगी। तीसरे स्टेज में यह 300 किलोमीटर तक जाएगी। कुल मिलाकर यह 800 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचेगी।
प्रमुख भारतीय मिसाइल
मिसाइलें भारतीय सुरक्षा प्रणाली की रीढ़ हैं और डीआरडीओ के अनुसार मिसाइल तकनीक के लिहाज से कुछ मामलों में भारत चीन से भी आगे है। भारत के पास मौजूद प्रमुख मिसाइल हैंः
अग्नि-1
अग्नि-1 पर काम 1999 में शुरु हुआ था लेकिन परीक्षण 2002 में किया गया. इसे कम मारक क्षमता वाली मिसाइल के तौर पर विकसित किया गया था। यह 700 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है। भारत ने परमाणु क्षमता संपन्न अग्नि-1 प्रक्षेपास्त्र के कई सफल परीक्षण कर चुकी है। अग्नि-1 को पहले ही भारतीय सेना में शामिल कर लिया गया है लेकिन सेना से जुड़े लोगों के प्रशिक्षण और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए इसका समय-समय पर प्रायोगिक परीक्षण किया जाता है।
अग्नि-2
जमीन से जमीन तक मार करने वाली अग्नि-2 मिसाइल का व्हीलर आईलैंड से मई 2010 में सफल परीक्षण किया। इससे पहले 2009 में इसका परीक्षण दो बार असफल हो गया था। अग्नि-2 मिसाइल की मारक क्षमता दो हजार किलोमीटर है और ये एक टन तक का पेलोड ले जा सकती है। यह अति आधुनिक नेवीगेशन सिस्टम और तकनीक से लेस है। अग्नि-2 भारतीय सेना में शामिल की जा चुकी है।
अग्नि -3
भारत ने परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता वाली मिसाइल अग्नि-3 का विकास किया। इसका पहला परीक्षण 2006 में किया गया। इसकी मारक क्षमता 3500 किलोमीटर है। यह जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल है। 3500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली ये मिसाइल 17 मीटर लंबी है जिसका व्यास दो मीटर है। यह 1.5 टन का पेलोड ले जा सकता है। यह अति आधुनिक कम्प्यूटर और नेवीगेशन सिस्टम से लेस है।
अग्नि-4
ओडिशा के व्हीलर द्वीप से करीब तीन हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल अग्नि-4 का सफल प्रक्षेपण नवंबर 2011 को किया गया। इसमें कई नई तकनीकों का इस्तेमाल पहली बार किया गया है। यह अपनी पूर्ववर्तियों की तुलना में कहीं ज्यादा आधुनिक, सटीक और हल्की है। परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम लगभग एक हजार किलोग्राम के पेलोड क्षमता वाली अग्नि-4 बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-2 मिसाइल का ही उन्नत रूप है। पहली बार इसका प्रक्षेपण 2010 में दिसंबर में हुआ था लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से ये सफल नहीं हो पाया था।
पृथ्वी-1
पृथ्वी-1 युद्ध भूमि में काम आने वाली 150 किलोमीटर तक वार करने में सक्षम मिसाइल है। यह 1000 किलोमीटर तक का विस्फोटक ले जा सकती है। अपनी श्रेणी में यह दुनिया की किसी भी मिसाइल से यह अधिक खतरनाक है। यह भारतीय थल सेना में शामिल की जा चुकी है।
पृथ्वी-2
पृथ्वी-2 मिसाइल 250 किलोमीटर तक वार करने में सक्षम है और भारतीय वायु सेना की जरूरतों के अनुरूप भी इसे डिजायन किया गया है। यह 500 किलोग्राम तक विस्फोटक ले जा सकती है। वर्ष 2011 में ओडिशा के चांदीपुर से पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया था। पृथ्वी-2 सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है। इसमें किसी भी एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल को झांसा देकर निशाना साधने की क्षमता है।
पृथ्वी-3
पृथ्वी-3 भारतीय नौ सेना की मिसाइल है, जो 350 किलोमीटर तक वार करने में सक्षम है और 500 किलोग्राम तक विस्फोट ले जा सकती है। पृथ्वी रेंज की मिसाइलें भारत ने स्वदेशी तकनीक से विकसित की है और भारतीय सेना में इसे शामिल किया जा चुका है। भारत के एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत पृथ्वी पूर्ण रुप से स्वदेश में निर्मित पहली बैलेस्टिक मिसाइल है। यह द्रवित इंजन से संचालित होती है।
धनुष
धनुष मिसाइल को नौसेना के इस्तेमाल के लिए विकसित किया गया है और यह 350 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित लक्ष्य को भेद सकती है। यह पृथ्वी मिसाइल का नौसैनिक संस्करण है। इसकी लंबाई दस मीटर और चैड़ाई एक मीटर है और यह भी 500 किलोग्राम तक के हथियार ढो सकती है। इसे डीआरडीओ ने विकसित किया है और इसका निर्माण भारत डाइनेमिक्स लिमिटिड ने किया है।
ब्रह्मोस
28 अप्रैल, 2002 को भारत ने ध्वनि की गति से भी तेज चलने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का परिक्षण किया था और इसे ब्रहमोस का नाम दिया। भारत ने इसका निर्माण रूस के सहयोग से किया है। दोनों देशों के बीच 1998 में इस मिसाइल को विकसित करने के लिए करार हुआ था। ब्रह्मोस 290 किलोमीटर तक की मार करने की क्षमता रखता है और इसका वजन तीन टन है। ये जहाज, पनडुब्बी और हवा समेत किसी भी प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है। यह मिसाइल ध्वनि की गति से 2.8 गुना ज्यादा गति से उड़ान भर सकती है। ब्रहमोस मिसाइल प्रणाली सेना की दो रेजीमेंट में पूरी तरह काम करने लग गई है।
सागरिका
सागरिका समुद्र से दागी जा सकती है और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। सबमरीन लाँच्ड बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) सागरिका को 2008 में विशाखापत्तनम के तटीय क्षेत्र से छोड़ा गया था। यह 700 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती है।
आकाश
आकाश जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। 700 किलोग्राम वजनी यह मिसाइल 55 किलोग्राम का पेलोड साथ ले जा सकती है। इसकी गति 2.5 माक है और यह मिसाइल प्रणाली कई निशानों को एक साथ भेद सकती है। साथ ही यह मानवरहित वाहन, युद्धक विमान और हेलीकॉप्टरों से दागी गई मिसाइलो को भी नष्ट कर सकती है। इस प्रणाली को भारतीय पेट्रीयट प्रणाली भी कहा जाता है। आकाश मिसाइल प्रणाली 2030 और उसके बाद तक भारतीय वायु सेना का अहम हिस्सा रहेगी।
प्रहार
प्रहार जमीन से जमीन तक मार करने वाली मिसाइल है। इसकी मारक क्षमता 150 किलोमीटर है। ये कई तरह के वॉरहेड ले जाने की क्षमता रखती है। इसकी लंबाई 7.3 मीटर, वजन 1280 किलोग्राम और डायामीटर 420 मिलीमीटर है। 200 किलोग्राम का पेलोड ले जाने में सक्षम इस मिसाइल का रिएक्शन टाइम काफी कम है। ये मल्टी बैरल रॉकेट और मध्यम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल के बीच की श्रेणी को भरने का अहम काम करती है और भारतीय जरूरतों के अनुसार मध्यम श्रेणी तक मार करने के लिए बेहतरीन विकल्प है।
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